(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

सभापर्व ~ महाभारत | Mahabharat Sabha Parv In Hindi


॥ श्रीः ॥
2.80. अध्यायः 080
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Topics
दुर्योधनम्प्रति धृतराष्ट्रेण पाण्डवेषु द्वेषनिषेधनम्॥ 1॥
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Text

धृतराष्ट्र उवाच।

त्वं वै ज्येष्ठो ज्यैष्ठिनेयः पुत्र मा पाण्डवान्द्विषः।
द्वेषा ह्यसुखमादत्ते यथैव निघनं तथा॥ 2-80-1(14572)
अव्युत्पन्नं समानार्थं तुल्यमित्रं युधिष्ठिरम्।
अद्विषन्तं कथं द्विष्यात्त्वादृशो भरतर्षभ॥ 2-80-2(14573)
तुल्याभिजनवीर्यश्च कथं भ्रातुः श्रियं नृप।
पुत्र कामयसे मोहान्मैवं भूः शाम्य मा शुचः॥ 2-80-3(14574)
अथ यज्ञविभूतिं तां काङ्क्षसे भरतर्षभ।
ऋत्विजस्तव तन्वन्तु सप्ततन्तुं महाध्वरम्॥ 2-80-4(14575)
आहरिष्यन्ति राजानस्तवापि विपुलं धनम्।
प्रीत्या च बहुमानाच्च रत्नान्याभरणानि च॥ 2-80-5(14576)
अनार्याचरितं तात परस्वस्पृहणं भृशम्।
स्वसन्तुष्टः स्वधर्मस्थो यः स वै सुखमेधते॥ 2-80-6(14577)
`मही कामदुघा सा हि वीरपत्नीति चोच्यते।
तथा वीरस्य भार्या श्रीस्ते इमे हि कलत्रवत्॥ 2-80-7(14578)
तवाप्यस्ति हे चेद्वीर्यं भोक्ष्यसे हि महीमिमाम्॥ 2-80-8(14579)
अयुक्तमिदमेतत्तु परस्वहरणं भृशम्।
उभयोर्लोकयोर्दुःखं सुहृदां काङ्क्षतोऽनयम्॥ 2-80-9(14580)
अव्यापारः परार्तेषु नित्योद्योगः स्वकर्मसु।
रक्षणं समुपात्तानामेतद्वैभवलक्षणम्॥ 2-80-10(14581)
विपत्तिष्वव्यथो दक्षो नित्यमुत्थानवान्नरः।
अप्रमत्तो विनीतात्मा नित्यं भद्राणि पश्यति॥ 2-80-11(14582)
बाहूनिवैतान्मा च्छेत्सीः पाण्डुपुत्रास्तथैव ते।
भ्रातृणां तद्धनार्थं वै मित्रद्रोहं च मा कुरु॥ 2-80-12(14583)
पाण्डोः पुत्रान्मा द्विषस्वेह राजं-
स्तथैव ते भ्रातृधनं समग्रम्।
मित्रद्रोहे तात महानघर्मः
पितामहा ये तव तेऽपि तेषाम्॥ 2-80-13(14584)
अन्तर्वेद्यां ददद्वित्तं कामाननुभवन्प्रियान्।
क्रीडन्स्त्रीभिर्निरातङ्कः प्रशाम्य भरतर्षभ॥ ॥ 2-80-14(14585)

इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि अशीतितमोऽध्यायः॥80 ॥

Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Footnotes
2-80-1 ज्येष्ठाया अपत्यं ज्यैष्ठिनेयः॥ 2-80-2 अव्युत्पन्नं परकपटानभिज्ञम्। समानार्थं तुल्यधनम्। तुल्यमित्रं त्वन्मित्रा द्रोहिणम् अद्विषन्तं च त्वामपीति शेषः॥


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